जिंदा हूँ…

एक समय था जब मैं ये गाना ‘ये है मेरी कहानी’ (फिल्म: जिंदा) पूरे दिन सुना करती थी। आज जब बहुत साल बाद ये गाना दोबारा सुना तो उतना ही अच्छा लगा। वो वक़्त जिंदगी का काश कभी लौट कर ना आये। इस गाने के साथ कई यादें जुडी थीं जो एक-एक करके याद आयीं। खैर… यादों की बरात को न्योता फिर कभी देंगे, आज फिलहाल इस कविता पे गौर कीजिये जो इस गाने के दो शब्द ‘जिंदा हूँ’ को ध्यान में रख कर, उन दिनों के लिए लिखी गयी है जो अब जिंदगी की नीव का इम्तिहान समझे जाते हैं।

जिंदा हूँ मैं…

अपने चेहरे पर खिली उस मुस्कान में

दिनभर के काम से हुई उस थकान में

तो क्या हुआ गर आज मैं तन्हाँ हूँ 

ख़ामोशी में इस धड़कन की गूँज कहती है …

…मैं जिंदा हूँ  

हाँ जिंदा हूँ मैं…

खुली आँखों से देखे हर ख्वाब में

जिंदगी को दिए गए हर जवाब में

तो क्या हुआ गर आज मैं बिखरा हूँ

बिखरे हर टुकड़े की दास्ताँ ये कहती है…

…मैं जिंदा हूँ

4 thoughts on “जिंदा हूँ…

  1. Cool yaar garry.i must say you are toooooooooooooooooooooooooooooooooooo gooooooooooooooooooodddddddddddddd muahhhhhhhhhhhhhhhhh🙂 keep it up

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