The Grey Area and…. ज़मीर !!!

जिंदगी की कहानी कभी कभी ऐसे मोड़ पे आके रुक जाती है जहाँ आगे अँधेरे की सिवा कुछ नज़र नहीं आता. ऐसे में निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है. आगे बड़ने का मतलब है अपने साए का साथ भी छोड़ देना. बोहोत कम होते हैं जो उस अँधेरे में जाने की हिम्मत रखते हैं. बाक़ी तो बस मुड़ के वापस एक रौशनी से भरे अन्धकार में आ जाते हैं. अँधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यूँ ना सवेरा तो होता ही है. उड़ना वो ही सीख पता है जो ऊँचाई से गिरा हो.

माता पिता बच्चो को ये सिखाते हैं की वो गलतियाँ ना करें, पर कई बार ये बताना भूल जाते हैं की अगर गलती हो तो उसको सुधारें कैसे? और एक इंसान गलती ना करे ऐसा तोह हो नहीं सकता. तो अच्छा यही है के बच्चो को सही गलत की पहचान करायी जाये ताकी जब उनसे कोई भूल हो तो वो उस भूल को पहचानें और फिर उसे सुधारें. और क्यूंकि कोई गलती करके उसको सुधार जा सकता है तो इसका मतलब यह भी नहीं होना चाहिए के गलती करने का लाईसेंस मिल गया. गलती करो…माफ़ी मांगो और आगे बढ़ो.

दुनिया पहले सही और गलत में बटी होती थी, पर अब सही गलत के बीच का फासला बड़ गया है. इस बीच आ गया है “ग्रे एरिया” एक ऐसा क्षेत्र जिसे हम भ्रम कह सकते हैं. अक्सर लोग आजकल इसी का फायेदा उठाते नज़र आते हैं. हम आने वाले पीड़ी को ये सिखाना भूल रहे हैं के गलती करने पे अगर सजा मिल सकती है तोह माफ़ी भी…पर अगर गलती ये सोच के की जाये, “माफ़ी मांग लुंगी बाद में” वो भी अपने फायेदे के लिए तोह वो गलत है. फिर वो माफ़ी की क्या अहमियत जिसे महसूस ही ना किया जाये? इंसान को किसी दूसरे की ज़रुरत नहीं ये एहसास दिलाने के लिए की गलती हुई है…या वो गलती करने जा रहा है… हमारा ज़मीर या अंतर-आत्मा ये एहसास हमें दिलाती है. बस उसे सुन के अनसुना ना किया जाये.

माता पिता का पहला फ़र्ज़ अपने बच्चो का ज़मीर जगाना होना चाहिए. अगर हर माँ बाप ऐसा करें तोह शायद कुछ पीड़ियो के बाद एक ऐसा समय भी आयेगा जहाँ हमारी चित्रण की हुई दुनिया सच होगी…एक ऐसी दुनिया जहाँ बुरे ना हो…कोई ना बुरा कहे और ना बुरा सहे…ना बुरा करे और ना बुराई के लिए भरे….

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