Four years of 26/11 and an end to being-a-host to ‘national guest’

The terrorist destination in Mumbai after the attack on 26/11/2008

One of the terrorist destinations in Mumbai after the attack on 26/11/2008

छब्बीस ग्यारह – चार साल पहले इस तारीख ने देश में खौफ की परिभाषा बदल दी। दिवाली के महीने में मुंबई ने अजब आतिशबाजी देखी – बन्दूक की गोलियों की। दस, केवल दस आतंकवादियों ने पूरे देश की नींद लगभग चार दिन तक हराम करी। एक शहेर और ग्यारह जगह गोलाबारी – आंकड़ो पर गौर करें तो 164 मरे और 308 घायल हुए। आतंकियों ने बड़ी ही सोच समझ कर मुंबई में ऐसी जगहें चुनी जो लोगों से भरी रहती हैं। CCTV फुटेज में साफ़ दिखाई देगा कि हर वो जगह जहाँ इंसान के छुपने की गुंजाईश थी, उसको जांचा गया और एक एक इंसान को ढूँढ के मारा गया।
शायद ही कोई ऐसा होगा इस देश में जिसने उन हादसों की झलकियाँ ना देखी हो। अखबारों ने हर उस शख्स की कहानी छापी जो छब्बीस ग्यारह से ताल्लुक रखता था। हमने लोगो की आपबीती पढ़ी और सुनी जो जिन्दा बचे और उनसे उनके बारे में भी सुना जो मारे गए। सिर्फ सुना, महसूस उन्होंने किया। शायद हम दर्द कुछ हद तक समझ पाए, शायद। पर क्या कभी हम सोच सकते हैं या महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार पर क्या बीत रही होगी जिसका 22-23 साल का बेटा होटल मैनेजमेंट करके ख़ुशी ख़ुशी ताज होटल में नौकरी करने गया था। फायरिंग सुन कर उसने परिवारवालों को फ़ोन मिलाया और उनसे बात करते करते गोली खा के मर गया। फ़ोन पर दूसरी ओर से उसकी माँ या पिता उसकी सांस महसूस करने को तरस रहे होंगे शायद। क्या बीती होगी उस पति पर जिसकी बीवी बिज़नस के सिलसिले में मुंबई गयी हुई थी और ताज में रुकी हुई थी। गोलियों की आवाज़ से उसकी आँख खुली। अपने पति को फ़ोन मिलाया, बात पूरी नहीं हो पाई क्यूंकि कमरे के बहार आंतंकवादियो की आवाज़े सुन कर फ़ोन काटना पड़ा। ताज में बिजली काट दी गयी थी और कमरे में अँधेरा हो गया था। बहार जाना तोह मरने के बराबर था ही, उस युवती ने सोचा कि बेड के नीचे छुप कर पति से मेसेज पर बात करी जाये। वो पति को हर बात, हर पल के बारे में मेसेज पर बताती रही। ” 2-3 लोगो की आवाज़े आ रही हैं लौबी से”, “आवाजें करीब आ रही हैं”, “अब मुझे उनके कदमो की आवाज़ भी आ रही है, वो इसी ओर आ रहे हैं”, “कोई दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रहा है” और इसके बाद मेसेज आने बंद। वो पति इंतज़ार कर रहा होगा एक और मेसेज आने का जिसमे लिखा होता “मैं बच गयी, वो लोग मुझे नहीं ढूँढ पाए”, पर कोई मेसेज नहीं आया। उन पुलिस अफसरों के परिवार वालो के बारे में सोचा होगा कभी तो, जिनको पता था की उनका पति, बेटा या भाई मुंबई को बचाने में अपनी जान दाव पर लगाये हुए लड़ रहे हैं। उनकी चिंता परिवार को खाए जा रही होगी, बेबस लोग फ़ोन करके पूछ भी नहीं पा रहे होंगे कि वो ठीक तो हैं।
खुशनसीब थे वो लोग जिनको आखिरी लम्हों में उनकी आवाज़ सुन ने को मिली जिनसे वो बेहद प्यार करते थे, उनको मौका मिला बताने का कि वो जा रहे हैं और ये जताने का की वो अपनों से कितना प्यार करते हैं। मरने वालो में सैंकड़ो लोग ऐसे थे जिन्हें ये मौका नसीब नहीं हुआ। वो घर से निकले तो थे वापस आने का वादा करके, पर वादा पूरा नहीं कर पाए। वो बच्चे तो शायद इंतज़ार ही करते रहे होंगे जिनके माता पिता ऑफिस जाते थे और रोज़ CST से ट्रेन पकड़ते थे। वो भाई कितना बेबस होगा जो राखी का वादा ना रख पाया हो, जिसकी बहन रास्ते में ही गोलियों का शिकार हो गयी हो। वो माता पिता जिनके बच्चे घर लौट के नहीं आये, कहाँ ढूँढा होगा उन्होंने उनको। ये तो केवल कुछ ही किस्से हैं, पर ये काफी हैं ये सोचने के लिए कि क्या हम (जिन्होंने 26/11 सिर्फ टीवी पर देखा और अखबारों में पढ़ा) सच में महसूस कर पाए वो दर्द, वो बेबसी अपनों को खोने की? कई लोगो के अब जीना शायद रोज़ की एक लड़ाई बन गयी है। कई लोग अपनी जिंदगियो को फिर से शुरू कर पाए होंगे और कई अब भी जूझ रहे होंगे।
ऐसे में कसाब को फांसी देना सही था या गलत?
सच है कि कसाब को फांसी लगने से वो लोग जिंदा वापस नहीं होंगे जो मरे थे। पर क्या उस इंसान को जिंदा रहने का हक है जिसने ऐसी दहशत फैलाई? फांसी के अलावा क्या कोई ऐसी सज़ा थी जो बाकी आतंकियों के लिए एक सबक बन सके? माना कि ये आंतंकवादी ये सोच के ही आते हैं कि वो मारे जायेंगे, पर ऐसे में उन्हें जेल में महफूज़ रखना क्या औरों को बढावा नहीं देता? हर आतंकवादी यही सोचता कि यहाँ मेरा परिवार सुखी रहेगा और वहाँ मैं जेल में जिंदा रहूँगा। क्या हम लोगो का इस बात पर टिपण्णी करना सही है कि लोग क्यों खुश हैं कसाब की मौत से? क्या हम पर वो बीती जो उन पर बीती? क्या हम उनका परिवार चलाने में कोई मदद कर रहे हैं? या उनके ज़ख्मो पर मलहम लगाने की कोशिश की हमने? हमने सिर्फ टीवी के सामने बैठ कर ये अनुमान लगाया कि मुंबई में सैंकड़ो लोग किस दहशत से गुज़र रहे होंगे, हमने सिर्फ अनुमान लगाया – सिर्फ अनुमान। ऐसे में हम होते कौन हैं ये कसाब की मौत पर कोई भी टिपण्णी करने वाले?
केवल वही लोग इस स्तिथि में कसाब की फांसी को गलत बता सकते हैं जिनका 26/11 से कोई लेना देना नहीं, ज़ाती तौर पर और मानसिक तौर पर; या फिर वो दुनिया की मोह-माया से परे हैं और साधुओ में गिने जाते हैं।
सबसे बड़ा डर तो तब होता इस देश पर जब कसाब कोई बड़ा नाम होता आतंकियों में। आंतंकी गुटों द्वारा उसको बचाने की कोशिशो में भी आम जनता ही पिसती।
भारत की एक टैक्स देने वाली नागरिक होने के नाते मैं ये ज़रूर कहना चाहुंगी कि मुझे ख़ुशी है कि मेरा पैसा अब कसाब को पालने में खर्च नहीं होगा। हालांकि मुझे पता है कि वो अब भी फ़िज़ूल खर्च ही किआ जायेगा, किसी ना किसी नेता की जेब भरण में ही जायेगा ये पैसा।
एक दुसरे देश से आये कसाब से तो हमें छुट्टी मिली, पर इस देश में पैदा हुए और पल रहे कसाबो का क्या जो कसाई बन इस देश को काटे जा रहे हैं???

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