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Dad – My Heart Your New Home…Welcome Home!

अपने पापा की बेटी हूँ मैं
उनकी गोद में पली हूँ मैं
घर के छोटों में
सबसे बड़ी हूँ मैं

उनकी परछाँई हूँ
उनका नाज़
उनकी सचाई हूँ
बड़े लाडों से पली हूँ मैं
अपने पापा की बेटी हूँ मैं

उनका दिल था बसेरा मेरा
उनकी हँसी में भी बसती थी मैं
ले गए साथ अपने
वो बचपन का डेरा
अब अचानक ही
बड़ी हो गई हूँ मैं

अब वो बसेंगे मेरी यादों में
खुद से किए कई वादों में
उनको याद कर
आँसू नहीं बहाउँगी मैं
उनकी सीख को
आगे बड़ाउँगी मैं

Yes, my fingers do tremble and my heart does go heavy when I type ‘was’ in the same sentence as ‘Dad’.

Many of you know and many are unaware of the fact that my Dad was in the hospital since 26th June, 2015. He underwent a brain surgery which left him in a state of coma. He recovered to a stage where he paid attention to what we would say, would look at us when called and would move his hand to hold ours. He had put up a great fight, before taking a leap towards his final journey to merge into the divine.

Early hours of 22nd January 2016, proved to be unfortunate for us. This phase and feeling is the worst part of gaining experience in age, we lose those we treasure. He protected me like a pearl in the shell while he was alive, and ensured the protection while he prepared himself for the final journey. He has left me with a mission to complete all that he wanted to accomplish.

With lots of gratitude and love, I now shall keep him alive in my heart!

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Six month old me with Dad. Copyrights reserved. This pic shall not be used for any purpose.

मैं तो सूपरमैन, सलमान की फ़ैन; लेकिन…

ऐसा तो होता ही है…कहीं कोई ग़म माना रहा होता है, तो कोई कहीं उसी बात पर हंस रहा होता है| अभी हाल ही में जब नेपाल में आए भूकंप को लोगो ने नहीं छोड़ा तो फिर सलमान ख़ान कौन से खेत की मूली है? और फिर सही भी है, इतने साल हो गये कोर्ट के चक्कर काटते काटते, डर के रहते रहते की कहीं जेल ना हो जाए…एक बार में कहानी ख़तम करो भाई, हर बार के चक्कर और डर से छुटकारा मिले| ग़लती तो की है, सज़ा भी मिलनी ही थी| अब जितना हो सके बचने की कोशिश तो हर कोई करता ही है, क्या आपने और हमने कभी ट्रॅफिक पुलिस वाले को दो चार सौ रुपए देकर छुटकारा नही किया? तो फिर सलमान ख़ान कोई बाहरी दुनिया की चीज़ तो नहीं अपना रहा| जो इस देश मे चलता आया है, जो चल रहा है और आँकड़े देखें जायें तो चलता रहेगा… बस वही तो किया सलमान ने| फ़र्क बस हैसियत और पहुँच का है| कोई बस दो हज़ार खर्च करने की क्षमता रखता है और कोई दो हज़ार करोड़! तो फिर हम मज़ाक बना किसका रहे हैं? सलमान का या फिर खुद का?

उन लोगों के बारे में तो क्या ही कहूँ जो सड़क पर सोने वालों की तुलना कुत्तों से कर रहे हैं? भाई मेरे, यह एक कहावत है कि कुत्ते को घी हज़म नहीं होता, शायद वैसे ही तुम्हें अपने पैसे और हैसियत हज़म नहीं हो रही| एक ने तो नशे में ग़लत काम किया (शायद) और भाई तुम बिना पिये ही बकवास करने में लगे हो! वाह क्या टॅलेंट है!!! ताज्जुब होता है कभी कभी के भगवान इतना मेहेरबान हो कैसे गया तुम पर?

अब काफ़ी लोगों को मेरा “शायद” लिखना खटक रहा होगा और गुस्सा आ रहा होगा कि मैं ऐसा कैसे कह सकती हूँ, ऐसी उम्मीद मुझसे बिल्कुल नहीं थी वगेरह वगेरह…चलिए फिर, आपकी खुशी के लिए ये मान के चलते हैं कि नशे में सलमान ने ही टक्कर मारी और शायद मान लेते हैं उस उम्मीद को जिसके तेहेत नहीं मारी| खुश? तोड़ा सा भी नहीं? मिट्टी पाओ फिर…आगे बढ़ते हैं…

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तो बहुत सारे लोग इस बात से गुस्सा हैं कि सलमान अगर निर्दोष था तो भागा क्यूँ? अब सब ये बोल ही रहें हैं कि वो नशे में था, जब नशा उतरा तो वापस भी आया ना? और तब से हर वो चीज़ मान ही रहा है जो उसे क़ानून के तेहेत करनी है?
हम क्यूँ ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सलमान या और कोई भी अभिनेता/ अभिनेत्री एक निपुण इंसान है? ग़लतियाँ तो होंगी हर किसी से होंगी, कुछ माफी के लायक होती हैं और कुछ सज़ा के| हम सब ग़लतियाँ करते हैं और फिर सज़ा से बचने की भी पूरी कोशिश करते हैं| सलमान ने क्या नया किया?
मैं सिर्फ़ ये समझने की कोशिश कर रही हूँ कि इतने सालों से जो वो “बींग ह्यूमन” कहता आ रहा है उसका मतलब क्या है?
शायद यही कि वो भी इंसान है! ग़लती करी, बचने की भी पूरी कोशिश करी…पर जब सज़ा मिलेगी तो भुगतेगा भी|

मैने ये भी सुना कि कुछ लोग विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरने की बात भी कर रहे थे| अब ये सुन के उन सब लोगों पर हँसी आई जो सलमान की मूर्ति पूजा करते हैं शायद| सलमान के बहुत से फ़ैन उदास हैं, पर उदासी का मतलब ये नहीं कि वो ये नहीं समझते की सलमान से शायद ग़लतियाँ हुई हैं| इस बात पर भी कई लोगों में आक्रोश है| भाई अब इंसान उदास भी ना हो?

मैं सलमान की फ़ैन हूँ, पर इसका मतलब ये नहीं है कि मैं ये नहीं चाहती कि उसे ग़लती की सज़ा ना मिले| आज शायद पहली बार किसी सेलेब्रिटी के लिए प्रार्थना की| इसलिए नहीं कि उसके गुनाह माफ़ हो जायें, पर इसलिए कि उसके गुनाहों की सज़ा मुक़र्रर करते वक़्त उसने जो थोड़े बहुत अच्छे काम किए हैं उनकी कृपा भी उसे मिले| बहुत से ऐसे लोग हैं जो एक बार नहीं पर बार बार ग़लतियाँ करते हैं, नशे या नादानी में नहीं….जानबूझ कर| पर इस इंसान ने शायद कुछ ग़लती सुधारने की कोशिश तो की| इतना उपर वही उठता है जो बहुत ज़ोर से नीचे गिरा हो| और ऐसा उठना भी हर किसी के बस की बात नहीं है|

उम्मीद करती हूँ और पूरा भरोसा है कि सलमान कोर्ट के फ़ैसले को सम्मान के साथ अपनाएगा|

धन्यवाद!

Ajnabi/अजनबी – A to Z Challenge Day 1

A

The letter A. The first one in the list. And I wanted to start with Hindi as I did last time too. Initiating the A to Z Challenge with Hindi as a token of respect to the language which is the basis of all the learning that I could accumulate so far and would continue to imbibe in the future.

Thank you Google Search for the image

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अजनबी/Ajnabi in English means ‘a Stranger’

है तो अजनबी
पर अपना सा लगता है
कड़कती धूप सी ज़िंदगी मे
एक सुहाना सपना सा लगता है
आ जाए गर सामने
तो क्या पहचानूँगी मैं उसे
आ जाए गर सामने
तो क्या पहचानूँगी मैं उसे
दिल पर कोई तो दस्तक होगी
शायद ऐसा लगता है
है तो अजनबी
पर पता नहीं क्यूँ अपना सा लगता है

 

सोचती हूँ अक्सर उसके बारे में
लोगों की भीड़ में
तन्हाई के सन्नाटे में
सुकून देता है उसका ख़याल
जैसे एक घने जंगल में
किसी चिड़िया की हो आवाज़
जैसे एक नाव
आ गयी हो अपने साहिल के पास
जैसे रात के अंधेरे में
मुस्कुराता हुआ चाँद

 

है तो अजनबी
पर अपना साया सा लगता है
दिसंबर की सर्दी में
चाय का गरम प्याला सा लगता है
हुए गर हम रु-बा-रु
तो क्या पहचानेगा वो मुझे
हुए गर हम रु-बा-रु
तो क्या पहचानेगा वो मुझे
दिल सुनेगा वो धीमी सी आहट
शायद ऐसा लगता है
है तो अजनबी
पर पता नहीं क्यूँ अपना ही साया लगता है

English Translation:

Though he is a stranger,
But seems like my own.
Pleasant as a soothing dream,
Of a journey in scorching sun.
Will I recognize him,
If he happen to cross my way?
There will be a knock on the doors of heart,
This is what I believe.
Though he is a stranger,
But I don’t know why he seems to be my own.

I think about him often,
Be it a midst the crowd
Or in the silence of my loneliness.
Even his thought soothes my soul,
Like the sound of a bird
In otherwise calm forest.
Like a boat
Which just met its shore.
Like a shining moon
During the darkest of night.

Though he is a stranger,
But seem as close as my shadow.
Warm as a cup of tea,
In the winters of December.
Will we recognize each other,
If we come face to face?
The heart will hear the sounds of steps,
Is something I believe.
Though he is a stranger
But I don’t know why he seems as close as my shadow.

PS. I wish that the translation in English could rhyme too, but I hope my English readers were able to get the gist of what I tried to say in Hindi. Thank you for reading!

~ooOoo~

Click here to know about my Theme for A to Z Challenge

 

ख्वाब

Dream

एक ख्वाब है जो आँखो के कोनो मे घर कर गया है
अब ना वो जागने देता है और ना सोने
ये दिल है जो इस ख्वाब से प्यार कर बैठा है
अब ना ये रखते बनता है ना छोड़ते

आँख लगती है तो चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है
जब हक़ीकत ख्वाब से मिल जाती है
आँख खुलते ही सच्चाई सामने आती है
और दो पल की हक़ीकत फिर बस ख्वाब में बदल जाती है

एक ख्वाब है जो आँखो के कोनो मे घर कर गया है
अब ना वो हँसने देता है और ना रोने
ये दिल है जो इस ख्वाब से प्यार कर बैठा है
अब ना वो मुझे जीने देता है और ना मरने

ख्वाब हो तो ऐसा जिसके पूरे होने से ज़िंदगी संवर जाती है
और जिसके टूटने से दुनिया बिखर जाती है
वही ख्वाब है जिससे जीने की वजह मिल जाती है
खोई हुई उम्मीद लौट आती है

प्यार का एहसास

कोई ये कैसे बतलाए की उसे प्यार है
किसी एक के बिना इस दुनिया की हर खुशी बेकार है
कोई ये कैसे कहे की उसे किसी की ज़रूरत है
हर उदासी को टालती बस वो एक सूरत है

किसी को क्या पता दीवानगी क्या होती है
पूरी रात जागना क्या कम है…
…जब सारी दुनिया सोती है
दुनिया की हर चीज़ व्यर्थ लगती है
जो इस दिल को सुकून दे…
…वो उस चेहरे की एक मुस्कान होती है

कोई मीलो चल के आता है
बस एक झलक के लिए
और कोई मीलो की दूरियो मे भी
उस एहसास को पता है जीने के लिए

जब पूरी दुनिया बस एक हँसी मे समा जाती है
तो समझो इस दिल को मोहब्बत हो जाती है

Four years of 26/11 and an end to being-a-host to ‘national guest’

The terrorist destination in Mumbai after the attack on 26/11/2008

One of the terrorist destinations in Mumbai after the attack on 26/11/2008

छब्बीस ग्यारह – चार साल पहले इस तारीख ने देश में खौफ की परिभाषा बदल दी। दिवाली के महीने में मुंबई ने अजब आतिशबाजी देखी – बन्दूक की गोलियों की। दस, केवल दस आतंकवादियों ने पूरे देश की नींद लगभग चार दिन तक हराम करी। एक शहेर और ग्यारह जगह गोलाबारी – आंकड़ो पर गौर करें तो 164 मरे और 308 घायल हुए। आतंकियों ने बड़ी ही सोच समझ कर मुंबई में ऐसी जगहें चुनी जो लोगों से भरी रहती हैं। CCTV फुटेज में साफ़ दिखाई देगा कि हर वो जगह जहाँ इंसान के छुपने की गुंजाईश थी, उसको जांचा गया और एक एक इंसान को ढूँढ के मारा गया।
शायद ही कोई ऐसा होगा इस देश में जिसने उन हादसों की झलकियाँ ना देखी हो। अखबारों ने हर उस शख्स की कहानी छापी जो छब्बीस ग्यारह से ताल्लुक रखता था। हमने लोगो की आपबीती पढ़ी और सुनी जो जिन्दा बचे और उनसे उनके बारे में भी सुना जो मारे गए। सिर्फ सुना, महसूस उन्होंने किया। शायद हम दर्द कुछ हद तक समझ पाए, शायद। पर क्या कभी हम सोच सकते हैं या महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार पर क्या बीत रही होगी जिसका 22-23 साल का बेटा होटल मैनेजमेंट करके ख़ुशी ख़ुशी ताज होटल में नौकरी करने गया था। फायरिंग सुन कर उसने परिवारवालों को फ़ोन मिलाया और उनसे बात करते करते गोली खा के मर गया। फ़ोन पर दूसरी ओर से उसकी माँ या पिता उसकी सांस महसूस करने को तरस रहे होंगे शायद। क्या बीती होगी उस पति पर जिसकी बीवी बिज़नस के सिलसिले में मुंबई गयी हुई थी और ताज में रुकी हुई थी। गोलियों की आवाज़ से उसकी आँख खुली। अपने पति को फ़ोन मिलाया, बात पूरी नहीं हो पाई क्यूंकि कमरे के बहार आंतंकवादियो की आवाज़े सुन कर फ़ोन काटना पड़ा। ताज में बिजली काट दी गयी थी और कमरे में अँधेरा हो गया था। बहार जाना तोह मरने के बराबर था ही, उस युवती ने सोचा कि बेड के नीचे छुप कर पति से मेसेज पर बात करी जाये। वो पति को हर बात, हर पल के बारे में मेसेज पर बताती रही। ” 2-3 लोगो की आवाज़े आ रही हैं लौबी से”, “आवाजें करीब आ रही हैं”, “अब मुझे उनके कदमो की आवाज़ भी आ रही है, वो इसी ओर आ रहे हैं”, “कोई दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रहा है” और इसके बाद मेसेज आने बंद। वो पति इंतज़ार कर रहा होगा एक और मेसेज आने का जिसमे लिखा होता “मैं बच गयी, वो लोग मुझे नहीं ढूँढ पाए”, पर कोई मेसेज नहीं आया। उन पुलिस अफसरों के परिवार वालो के बारे में सोचा होगा कभी तो, जिनको पता था की उनका पति, बेटा या भाई मुंबई को बचाने में अपनी जान दाव पर लगाये हुए लड़ रहे हैं। उनकी चिंता परिवार को खाए जा रही होगी, बेबस लोग फ़ोन करके पूछ भी नहीं पा रहे होंगे कि वो ठीक तो हैं।
खुशनसीब थे वो लोग जिनको आखिरी लम्हों में उनकी आवाज़ सुन ने को मिली जिनसे वो बेहद प्यार करते थे, उनको मौका मिला बताने का कि वो जा रहे हैं और ये जताने का की वो अपनों से कितना प्यार करते हैं। मरने वालो में सैंकड़ो लोग ऐसे थे जिन्हें ये मौका नसीब नहीं हुआ। वो घर से निकले तो थे वापस आने का वादा करके, पर वादा पूरा नहीं कर पाए। वो बच्चे तो शायद इंतज़ार ही करते रहे होंगे जिनके माता पिता ऑफिस जाते थे और रोज़ CST से ट्रेन पकड़ते थे। वो भाई कितना बेबस होगा जो राखी का वादा ना रख पाया हो, जिसकी बहन रास्ते में ही गोलियों का शिकार हो गयी हो। वो माता पिता जिनके बच्चे घर लौट के नहीं आये, कहाँ ढूँढा होगा उन्होंने उनको। ये तो केवल कुछ ही किस्से हैं, पर ये काफी हैं ये सोचने के लिए कि क्या हम (जिन्होंने 26/11 सिर्फ टीवी पर देखा और अखबारों में पढ़ा) सच में महसूस कर पाए वो दर्द, वो बेबसी अपनों को खोने की? कई लोगो के अब जीना शायद रोज़ की एक लड़ाई बन गयी है। कई लोग अपनी जिंदगियो को फिर से शुरू कर पाए होंगे और कई अब भी जूझ रहे होंगे।
ऐसे में कसाब को फांसी देना सही था या गलत?
सच है कि कसाब को फांसी लगने से वो लोग जिंदा वापस नहीं होंगे जो मरे थे। पर क्या उस इंसान को जिंदा रहने का हक है जिसने ऐसी दहशत फैलाई? फांसी के अलावा क्या कोई ऐसी सज़ा थी जो बाकी आतंकियों के लिए एक सबक बन सके? माना कि ये आंतंकवादी ये सोच के ही आते हैं कि वो मारे जायेंगे, पर ऐसे में उन्हें जेल में महफूज़ रखना क्या औरों को बढावा नहीं देता? हर आतंकवादी यही सोचता कि यहाँ मेरा परिवार सुखी रहेगा और वहाँ मैं जेल में जिंदा रहूँगा। क्या हम लोगो का इस बात पर टिपण्णी करना सही है कि लोग क्यों खुश हैं कसाब की मौत से? क्या हम पर वो बीती जो उन पर बीती? क्या हम उनका परिवार चलाने में कोई मदद कर रहे हैं? या उनके ज़ख्मो पर मलहम लगाने की कोशिश की हमने? हमने सिर्फ टीवी के सामने बैठ कर ये अनुमान लगाया कि मुंबई में सैंकड़ो लोग किस दहशत से गुज़र रहे होंगे, हमने सिर्फ अनुमान लगाया – सिर्फ अनुमान। ऐसे में हम होते कौन हैं ये कसाब की मौत पर कोई भी टिपण्णी करने वाले?
केवल वही लोग इस स्तिथि में कसाब की फांसी को गलत बता सकते हैं जिनका 26/11 से कोई लेना देना नहीं, ज़ाती तौर पर और मानसिक तौर पर; या फिर वो दुनिया की मोह-माया से परे हैं और साधुओ में गिने जाते हैं।
सबसे बड़ा डर तो तब होता इस देश पर जब कसाब कोई बड़ा नाम होता आतंकियों में। आंतंकी गुटों द्वारा उसको बचाने की कोशिशो में भी आम जनता ही पिसती।
भारत की एक टैक्स देने वाली नागरिक होने के नाते मैं ये ज़रूर कहना चाहुंगी कि मुझे ख़ुशी है कि मेरा पैसा अब कसाब को पालने में खर्च नहीं होगा। हालांकि मुझे पता है कि वो अब भी फ़िज़ूल खर्च ही किआ जायेगा, किसी ना किसी नेता की जेब भरण में ही जायेगा ये पैसा।
एक दुसरे देश से आये कसाब से तो हमें छुट्टी मिली, पर इस देश में पैदा हुए और पल रहे कसाबो का क्या जो कसाई बन इस देश को काटे जा रहे हैं???

hmmmm…

जिंदगी क्यों इतनी तेज़ भाग रही है? पर तब भी काफी समय बाद पीछे मुड़ के देखो तोह लगेगा की हम वहीँ हैं जहाँ थे. सुबह के सूरज की किरणों का सेक, शाम को बालकोनी में बैठ के चाय का लुत्फ़ कहीं खो से गए हैं. आजकल तोह मौसम के बदलने का पता भी शायद न्यूज़ से पड़ता होगा. अपने ही घर में सरे अनजान से लगते हैं, हफ्ते बाद मिलो तोह लगता है रिश्तेदारों से मिल रहे हैं. ऑफिस में अब शायद दोस्त नही मिलते, मिलते हैं तोह सिर्फ प्रतियोगी, यहाँ हर किसी को आगे बड़ना है इस बीच कोई पीछे छूट भी जाये तोह क्या फरक पड़ता है. आजकल भीड़ का ज़माना नहीं है, तभी शायद हर कोई अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ रहा है. आज किस्मत अच्छी थी के बुखार आया, थोडा सोचने का वक़्त मिला. क्या रोज़ की इस मशक्कत से मुझे कुछ हासिल हो रहा है? शायद नहीं… सिवाए एक ऐसी थकान के जो शायद ही कभी जाये. दिल चाहता है थोडा रुकने का, जिंदा हूँ इस एहसास को महसूस करने का. पर दिमाग इस से विपरीत सुझाव देता है. दुनिया बदल गयी है, अगर आपको ठोकर लगती है और आप रुकते हो तोह आप सबसे पीछे रह जाते हो. किस्मत वाला है वो इंसान जिसके लिए अगले मोड़ पे कोई इंतज़ार कर रहा है या फिर कोई है जो हाथ बड़ा के सहारा देता है. अब खुद अपनी इच्छा से कुछ देर आराम करना शायद खुद ही अपना पैर कुल्हाड़ी पे मारना है. स्तिथि और गंभीर हो जाती है जब आपको पता है के इसके बाद आपको अकेले चलना है, सारे जाने-पहचाने चेहरे आगे बड़ गए होंगे, पर शायद कभी कभी बिलकुल अनजान लोगो में जा कर ही आप अपने और करीब आते हो. बहुत मुश्किल है दिल की आवाज़ सुनना जब आसपास का शोर कुछ और कह रहा हो. और जब आगे का कुछ ठिकाना ही ना हो तोह शोर को ही सच्चाई मान लेना बेहतर है….या शायद नहीं…